भारत की आत्मा यहां की गाँव में ही बसती है । अगर किसी को यह देश घूमना हो और यहाँ की संस्कृति देखनी व समझनी हो तो गाँव से बेहतर जगह कोई भी नहीं है । देश के इतिहास में मिथिलांचल की भी एक खास जगह है । यहाँ कभी ज्ञान और तप का प्रमुख केंद्र हुआ करता था । इतिहास की ओर देखें तो मधुबनी जिले के अंतर्गत ऊच्चैठ भगवती स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है । यह जगह प्राचीन विद्या व साधना केंद्र से जुड़ा हुआ है । ऐसा कहा जाता है कि महान् कवि कालिदास जो महामुर्ख हुआ करते थे उन्हें भी शिक्षा का वरदान इसी मंदिर में मिला था । हिमालय तथा राजधानी जनकपुर की ओर जाने वाले सभी ऋषि मुनि यहाँ तक कि भगवान राम खुद भी इस मंदिर से हो कर गुजरे हुए हैं ।

यह मंदिर दो मुख्य कारणों से आज भी काफी प्रसिद्ध है :-
१ . बेनीपट्टी प्रखंड से 5 KM की दूरी पर स्थित भगवती मंदिर । इसकी स्थापना के बारे में कहा जाता है यहाँ की यहाँ माता स्वयम् ही प्रदुर्भावित हुई है । थुम्हानी नदी के तट पर अवस्थित इस मंदिर को माता के 51 शक्तिपीठों मे से एक माना गया है । पहले यहाँ काफी घना जंगल हुआ करता था इस कारण इनको वनदुर्गा की संज्ञा भी दी गई है । मंदिर के अंदर माता की प्रतिमा भी काफी अलग है । काले रंग के पत्थर पर लगभग 2.5 फीट की प्रतिमा मे माता का केवल धड ही है सिर नहीं । जिसके कारण इनको छिनमस्तिका दुर्गा भी कहते हैं ।

मंदिर के बगल में ही शमशान होने की वजह से यह स्थान तन्त्र साधना के लिए भी काफी प्रचलित है । आज भी यहाँ देश के विभिन्न जगह से ( खासकर नवरात्र के समय ) साधक आ कर तप किया करते हैं । यहाँ अदृश्य शक्तियों का निवास माना जाता है जिसे आसानी से महसूस किया जा सकता है । देश और विदेश ( ज्यादातर नेपाल ) से यहाँ रोज़ सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन को आते हैं । नवरात्र में यह संख्या कई हज़ार प्रतिदिन पहुँच जाती है जिसे संभालने के लिए प्रशासन की तैनाती भी की जाती है । मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के साथ – साथ बहुत सारी मंदिर और प्रतिमायें मौजुद हैं ।

२. महाकवि कालिदास ज्ञान प्राप्ति स्थान :- कहा जाता है कि कालिदास अपनी पत्नी परम विदुषी विद्दोतमा से अपमानित होने के कारण यहाँ आ गए थे । वह ज्ञान अर्जित करना चाहते थे , परंतु महामुर्ख होने के कारण उन्होंने मंदिर के पास अवस्थित संस्कृत गुरुकुल में रसोईया का काम करने लगे । मंदिर और गुरुकुल के बीच एक विशाल मंदिर है । एक बार भयंकर बारिश होने के कारण बाढ़ आ गई थी और मंदिर में संध्या पूजा करने को कोई तैयार नहीं था । अंततः कालिदास को महामुर्ख होने के कारण उसे ही यह आदेश दिया गया और सबूत के लिए कोई निशान लगाकर आने को कहा गया । उन्होंने जैसे – तैसे मंदिर पहुंचकर दीपक जलाया और पूजा के उपरान्त कोई जगह न मिलने की वजह से माता की प्रतिमा पर ही कालिख लगाने को बढ़े । तभी माता प्रकट हुई और ऐसी मूर्खतापूर्ण परंतु भक्ति के कारण उन्हें एक वरदान मांगने को कहा । कालिदास ने अपनी आपबीती सुनाकर विद्या मांगा । माता ने रात भर के लिए कोई भी पुस्तक का स्पर्श मात्र से ही उसका कण्ठस्थ हो जाने का वरदान दे कर अंतर्ध्यान हो गई ।

इस घटना वाली रात के बाद आगे चल कर वह एक विद्वान् कवि के रूप में विख्यात हुए । उन्होंने अपनी सारी रचनायें जैसे मेघदूतम् , कुमारसम्भवम् आदि यही बैठ कर की है । लोग यहां की मिट्टी को लोग अपने बच्चों के अक्षराम्भ के लिए भी ले जाते हैं ।

उस नदी और गुरुकुल के अवशेष आज भी वहाँ मौजूद है । मंदिर प्रांगण में कालिदास के जीवन सम्बंधित अनेक चित्र भी बनाये गए हैं ।

कैसे पहुंचे :- यहाँ पहुंचने के लिए यातायात की कोई परेशानी नहीं है । नजदीकी रेलवे स्टेशन जिला मधुबनी (18.2 KM) से बस या टैक्सी आसानी से मिल जाती है । साथ ही नजदीकी हवाई – अड्डा दरभंगा ( 33.1 KM ) दूर है । यहां ठहरने की भी कोई दिक्कत नहीं परेशानी नहीं होती है ।

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